भगवान वेदव्यास द्वारा रचित प्रदोष व्रत की विधि, पूजन विधि, नियम, लाभ, कथा और आरती, प्रदोष व्रत की सम्पूर्ण विधि, कथा व महत्त्व का वर्णन हम यहाँ विस्तार से आपसे साझा कर रहे है। इस व्रत में प्रदोष के दिन भगवान शंकर- माता पार्वती की पूजा की जाती है। यह व्रत करने से भगवान शंकर अति प्रसन्न होते है। इस व्रत के करने से सब प्रकार के सांसारिक सुखो की प्राप्ति होती है। यह व्रत शीघ्र फलदायी होता है। इस व्रत को करने से पति-पत्नी का मन प्रसन्न रहता है, निर्धन धनवान, विद्वान, चिरायु, सौभाग्य वर्धक, विवाह संपन्न होना लाभ प्राप्त होते हैं। प्रदोष व्रत 11 या 21 प्रदोष तक करना चाहिए। इस व्रत में दिन में एक ही बार भोजन करना चाहिए।
प्रदोष व्रत की शास्त्रीय पूजा विधि Pradosh Vrat Vidhi
- प्रदोष व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर भगवान शंकर- माता पार्वती की पूजा करने के लिए स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। ब्रह्म मुहूर्त में उठना सबसे उत्तम होता है।
- पूजन सामग्री: प्रातःकाल ही भगवान शंकर- माता पार्वती की पूजा के लिए सामग्री तैयार कर ले। पूजा के लिये शुद्ध जल, चावल, पुष्प, फूल माला, फल, मिठाई(प्रसाद), अष्टगंध चन्दन, रोली, धूप, दीप, लौंग, इलायची, गंगाजल, पान, सुपारी, घी, कपूर, मोली(कलेवा या लच्छा), रुई, बिल्वपत्र, रुपए और ताम्बे का कलश की आवश्यकता होती है।
- पूजन का समय: संध्या के समय प्रदोष काल में(शाम को) शुभ मुहर्त में भगवान शंकर- माता पार्वती का पूजन कर लेना चाहिए। स्फटिक शिवलिंग की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
- मंत्र जाप: पूजा के समय ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते रहे।
- पूजन में स्फटिक शिवलिंग का पूजन किया जाता है।
- प्रदोष व्रत में बिना नमक का भोग लगाकर व्रत खोलने पर उसका सेवन करना चाहिए। दिन और रात में केवल एक समय ही भोजन ग्रहण करे। शाम के समय पूजन के उपरान्त किसी भी समय भोजन किया जा सकता है।
- हवन आहुति भी देना चाहिये। मंत्र (ॐ हीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा) से आहुति देना चाहिए।
- पूजन के अंत में भगवान शंकर की आरती जरूर करें।
- प्रदोष पूजन के पश्यात प्रदोष व्रत कथा सुननी चाहिए।
- प्रदोष कथा पढ़ने-सुनने के बाद पंचमुखहनुमत्कवचम्, श्री गणाधिपति स्तोत्र का पाठ करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।
प्रदोष व्रत के नियम Pradosh Vrat Rules
- किसी भी व्रत के सफल होने की संभावना तभी होती है, जब वह व्रत पूरे श्रद्धा भाव से और पवित्रता से किया जाए, बिना भाव और खिन्नता से व्रत करना कभी भी फलदायक नहीं होता है।
- त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत को किया जाता है और शुरू करने के पूर्व 11 या 21 प्रदोष व्रत करने का संकल्प लेना होता है।
- इस व्रत को स्त्री, पुरुष, बाल-वृद्ध कोई भी कर सकता है।
- व्रत के दिन सुबह से ही “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप मन ही मन करना चाहिए।
- यह व्रत अपने ही घर पर करना चाहिए, यदि प्रदोष के दिन आप यात्रा या प्रवास पर हो तो वह प्रदोष छोड़ कर अगले प्रदोष को व्रत करना चाहिए।
- संकल्प के 11 या 21 प्रदोष पुरे होने पर रीति अनुसार उद्यापन अवश्य करना चाहिए।
- व्रत पूरा होने पर उद्यापन में कम से कम 7 ब्राह्मण दम्पति को भोजन कराए।
- व्रत के दिन अगर स्त्री रजस्वला हो या घर में सूतक हो तो उस प्रदोष को स्त्री व्रत ना करे।
प्रदोष व्रत के लाभ/महत्त्व Pradosh Vrat Significance
- जिस भी मनोकामना से व्रत प्रारंभ किया जाता है, वह मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
- संतानहीन को श्रेष्ठ संतान प्राप्त होती है।
- सौभाग्यशाली स्त्री का सौभाग्य अखंड रहता है।
- कुंवारे लड़के व लड़की को मनभावन जीवनसाथी प्राप्त होता है।
- व्रत को करने से सभी प्रकार की विपत्तियां दूर होती है।
- सूतजी कहते है कि प्रदोष व्रत करने वाले को सौ गायो के दान का फल प्राप्त होता है।
प्रदोष वार परिचय Pradosh Vrat Days Type
रवि प्रदोष:- आयु आरोग्यता के लिए रवि प्रदोष करना चाहिए ।
सोम प्रदोष:- अभीष्ट सिद्धि हेतु सोम प्रदोष व्रत करें ।
मंगल प्रदोष:- रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य हेतु मंगल प्रदोष व्रत करें ।
बुध प्रदोष:- सर्व कामना सिद्धि के लिए बुध प्रदोष व्रत करें।
बृहस्पति प्रदोष:- शत्रु विनाश के लिए बृहस्पति प्रदोष करें ।
शुक्र प्रदोष:- सौभाग्य और स्त्री की समृद्धि के लिए शुक्र प्रदोष करें ।
शनि प्रदोष:- संतान प्राप्ति हेतु शनि प्रदोष व्रत करें।
प्रदोष व्रत की कथा निसंतान वैश्य की कथा (सोम प्रदोष व्रत कथा)
एक समय सभी प्राणियों के निहितार्थ परम पवित्र भागीरथी के तट पर ऋषि समाज द्वारा विशाल गोष्ठी का आयोजन किया गया। विज्ञ महर्षियो की एकत्रित सभा में व्यास जी के परम शिष्य पुराण वेता सूत जी हरि कीर्तन करते हुए पधारे, सूत जी को देखते ही शौनकादी अठ्यासी हजार मुनियों ने दंडवत प्रणाम किया। महा ज्ञानी सूत जी ने भक्ति भाव से ऋषियों को हृदय से लगाया तथा आशीर्वाद दिया। विद्वान ऋषि गण और सब शिष्य आसनों पर विराजमान हो गए।
मुनी गण विनीत भाव से पूछने लगे कि है परम दयालू ! कलीकाल में शंकर जी की भक्ति किस आराधना द्वारा उपलब्ध होगी, हम लोगों को बताने की कृपा कीजिए, क्योंकि कलयुग के सभी प्राणी पाप कर्म में रत होकर वेद शास्त्रों से विमुख रहेंगे। दीन जन अनेको संकटो से त्रस्त रहेंगे। हे मुनि श्रेष्ठ कली काल में सत्कर्म की ओर किसी की रुचि न होगी। जब पुण्य शीर्ण हो जाएंगे तो मनुष्य की बुद्धि असत्य कर्मों की ओर प्रेरित होगी, जिससे दुर्विचारी पुरुष वंश सहित समाप्त हो जाएंगे।
इस अखिल भूमंडल पर जो मनुष्य ज्ञानी होकर ज्ञान की शिक्षा नहीं देता, उससे परमपिता परमेश्वर कभी प्रसन्न नहीं होते हैं। हे महा मुनि ऐसा कौन सा उत्तम व्रत है, जिससे मनवांछित फल की प्राप्ति होती है, कृपा कर बतलाइए। ऐसा सुनकर दयालु ह्रदय श्री सूत जी कहने लगे श्रेष्ठ मुनियों तथा शौनक जी आप धन्यवाद के पात्र हैं, आपके विचार सराहनीय एवं प्रशंसनीय है। आप वैष्णवो में अग्रगण्य है, क्योंकि आपके हृदय में सदा परहित की भावना रहती है, इसलिए है शोनकादि ऋषियों सुनो, मैं उस व्रत को तुमसे कहता हूं जिसके करने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं, धन वृद्धि कारक, दुख विनाशक, सुख प्राप्त करने वाला, संतान देने वाला, मनवांछित फल प्राप्ति करने वाला यह व्रत तुमको सुनाता हूं। जो किसी समय भगवान शंकर ने सती जी को सुनाया था और उनसे प्राप्त यह परम श्रेष्ठ उपदेश मेरे पूज्य गुरु जी ने मुझे सुनाया था। जिसे आपको समय पाकर शुभ वेला में मैं सुनाता हूं। बोलो उमापति महादेव की जय।
सूतजी कहने लगे आयु वृद्धि, स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रदोष का व्रत करें।
इसकी विधि इस प्रकार है प्रातः स्नान कर निराहार रहकर शिवजी के ध्यान में मग्न हो शिव मंदिर में जाकर शंकर जी की पूजा करें। पूजा के पश्चात अर्धपुंड त्रिपुंड का तिलक धारण करें, बेलपत्र चढ़ाये। धुप, दीप, अक्षत से पूजा करें, ऋतु फल चढ़ाए (ओम नमः शिवाय) मंत्र का रुद्राक्ष माला से जप करें, ब्राह्मण को भोजन करा सामर्थ के अनुसार दक्षिण दे। तत्पश्यात मौन व्रत धारण करें, व्रती को सत्य भाषण करना आवश्यक है, हवन आहुति भी देना चाहिये। मंत्र (ॐ हीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा) से आहुति देना चाहिए। इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। व्रती पृथ्वी पर शयन करें, एक बार भोजन करें, इससे सर्वे कार्य सिद्ध होते हैं, श्रावण मास में तो इसका विशेष महत्व है। यह सर्व सुख, धन, आरोग्यता देने वाला होता है, यह व्रत इन सब मनोरथो को पूर्ण करता है। हे ऋषिवरो यह प्रदोष व्रत जो मैंने आपको बताया किसी समय शंकर जी ने सतीजी को और वेदव्यास मुनि जी ने मुझको सुनाया था।
शौनकादि ऋषि बोले- हे पूज्यवर महामते आपने यह व्रत परम गोपनीय, मंगलप्रद, कष्ट निवारक बतलाया है, कृपया यह बताने का कष्ट करें की यह व्रत किसने किया और उसे क्या फल प्राप्त हुआ?
सूत जी बोले हे विचारवान ज्ञानियों आप शिव के परम भक्त हैं, आपकी भक्ति देखकर में व्रती पुरुषों की कथा कहता हूं। प्राचीन समय में किसी नगर में एक वैश्य रहता था। वह वैश्य बहुत ही धनी था। उसे किसी बात का कष्ट न था। परंतु उसके पास विशाल वैभव होते हुए भी उसे कोई संतान न थी। जिसके कारण वैश्य हमेशा दुखी रहता था। वह वैश्य भगवान शिव का अनन्य उपासक था। प्रत्येक सोमवार को वह शिवजी की पूजा तथा व्रत किया करता था। सोमवार के दिन सांय काल वह शिव मंदिर में दीपक जलाता तथा उन्हें अनेक प्रकार के व्यंजन समर्पित करता था। इसके बाद पत्नी सहित भगवान का प्रसाद ग्रहण करता था।
उस वैश्य के भक्ति भाव को देखकर पार्वती दयाद्र हो गई और शिवजी से बोली हे शिवजी, यह वैश्य प्रति सोमवार को आपका पूजन कितनी श्रद्धा से करता है, आप इसकी संतानहीनता दूर क्यों नहीं करते हैं? पार्वती जी की बात सुनकर शिवजी ने कहा- ‘हे देवी इस वैश्य को संतान का न होना इसके पूर्व जन्मों का फल है और वह अपने कर्मों का फल भुगत रहा है।’ पार्वती जी ने कहा- हे भगवन यदि आप अपने भक्तों का कष्ट दूर नहीं करेंगे तो भक्तजन आपकी पूजा आराधना करेंगे। इसलिए आप उसे अवश्य ही पुत्रवान बनाइये। पार्वती जी के उत्तर से शिव जी ने कहा- ‘हे देवी मैं तुम्हारे आग्रह से उसे पुत्र प्राप्ति का वर देता हूं, परंतु उसके भाग्य में पुत्र-सुख न होने से वह पुत्र केवल 12 वर्ष तक की जीवित रह सकेगा।
कुछ काल के अनन्तर भगवान शिव की कृपा से वैश्य पत्नी गर्भवती हुई और दसवे मास में उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र उन्नत होने से वैश्य के घर में अत्यंत आनंद मनाया गया, परंतु फिर भी वह वैश्य निश्चिन्त न हो सका। क्योंकि वह जानता था कि यह पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही मेरे साथ रहेगा। इस प्रकार आनंद मंगल में 11 वर्ष का समय बीत गया।
एक दिन उसकी माता ने पति से पुत्र विवाह के लिए आग्रह किया। वैश्य ने अपनी पत्नी से कहा- ‘अभी विवाह की क्या चिंता है, अभी तो मैं इसे काशी में विद्या अध्ययन के लिए भेजना चाहता हूं।’ पत्नी से ऐसा कहकर उस वैश्य ने लड़के के मामा को बुलाया और उसे बहुत धन देकर कहा- ‘तुम अपने इस भांजे को पढ़ने के लिए काशी में ले जाओ। परन्तु एक बात ध्यान रखना कि मार्ग में ब्राह्मण को भोजन-दक्षिणा देते तथा यज्ञ करते हुए जाना।’ इस प्रकार घर से वे दोनों विदा होकर रास्ते में ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा देते हुए तथा यज्ञ करते हुए एक नगरी में पहुंच गए। संयोग से उस नगर के राजा की कन्या का विवाह उसी दिन था। कन्या अत्यंत सुन्दर और सुलक्षणा थी।
परंतु जिस राजकुमार से विवाह होने वाला था वह एक आंख का काना था, वर के पिता को यह बात की बहुत चिंता थी। जब उसने वैश्य के सुंदर पुत्र को देखा तो उसने उसके मामा से कहा- ‘यदि आप अपने भांजे को कुछ समय के लिए मुझे दे देवे तो, आपकी बड़ी कृपा होगी। विवाह के पश्यात मैं इसे आपके पास वापस भेज दूंगा और आपको बहुत सा धन दूंगा। लड़के के मामा ने अपने भांजे को नकली वर बनाकर विवाह मंडप में भेज दिया। विवाह कार्य विधिवत संपन्न हुआ। परंतु जब वैश्य पुत्र सिंदूरदान करके वापस लौटने लगा तो उसने राजकुमारी की साड़ी के एक छोर पर लिख दिया कि- ‘है प्रिय तुम्हारा विवाह मुझ वैश्य पुत्र के साथ हुआ है। अब मैं पढ़ने के लिए काशी जा रहा हूं। अब तुम्हें एक नकली वर के साथ विदा होना पड़ेगा, जो कि एक आंख का काना है और तुम्हारा पति नहीं है। इतना लिखकर वह वैश्य पुत्र चला गया।
विदाई के समय जब राजकुमारी ने अपनी साड़ी पर वैश्य पुत्र द्वारा लिखित बात पड़ी तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और उत्तर में कहा- ‘यह मेरा पति नहीं है मेरा पति तो वैश्या पुत्र है जो इस समय पढ़ने के लिए काशी चला गया है।’ राजकुमारी की बात सुनकर उसके माता-पिता बहुत ही सोच में पड़ गए और वर के पिता द्वारा किए गए छल से दुखी हुए और कन्या को विदा न किया। बारात खाली हाथ वापस लौट गई। उधर वे दोनों वैश्य काशी पहुंच गए। वहां जाकर वैश्य पुत्र विद्या अध्ययन तथा उसका मामा यज्ञ संपादन में लगा। इस प्रकार कुछ ही दिनों बाद उस लड़के के 12 वर्ष पूरे हो गए उस दिन यज्ञ हो रहा था। लड़के ने अपने मामा से कहा- ‘आज मेरी तबीयत ठीक नहीं जान पड़ रही है।इसलिए मैं सोने के लिए जा रहा हूं।’ ऐसा कह कर वह लड़का चला गया। थोड़ी देर बाद आकर जब मामा ने देखा तो अपने भांजे को मृत अवस्था में पाया। जिससे वह बहुत दुखी हुआ। परंतु उधर यज्ञ कार्य चल रहा था, इसलिए यज्ञ भंग होने की वजह से मोन ही रहा। जब यज्ञ की पूर्णाहुति हो गई और सभी ब्राह्मण वहां से चले गए तो वह जोरों से विलाप करने लगा।
उसी समय देव योग से पार्वती जी के साथ शिवजी उधर से निकल रहे थे। उस विलाप को सुनकर पार्वती का मन दयाद्र हो उठा और वह शिवजी से बोली- ‘हे भगवन इतना करुण क्रंदन कौन कर रहा है? आप वहां चलकर देखिए कि उसके रोने का क्या कारण है? पार्वती जी के आग्रह से शिवजी उस स्थान पर गए। वहां पहुंचकर पार्वती जी ने उस बालक को पहचान लिया और कहा- ‘हे भगवन आपके वरदान से उत्पन्न बालक मृत हो चुका है। इसका क्या कारण है शिवजी बोले- ‘हे देवी यह बालक अपनी पूरी आयु समाप्त कर चुका है और अब मृत्यु को प्राप्त हो गया है इसमें मैं क्या कर सकता हूं?
पार्वती जी ने कहा- ‘हे शिवजी आपने जिस प्रकार कृपा करके इसे 12 वर्ष की आयु दी थी। उसी प्रकार अनुग्रह करके इसे जीवन की पूरी आयु प्रदान कीजिए, नहीं तो वह वैश्य इसके वियोग में अपने प्राण छोड़ देगा। पार्वती जी के आग्रह से शिवजी ने उसे बालक को जीवन दान दिया और स्वयं पार्वती सहित शिवलोक को चले गए। इधर शिव जी के वरदान को पाकर वह बालक जी उठा और कुछ दिनों के बाद अपने मामा के साथ अपने नगर को प्रस्थान किया।
वहां से चलकर पुनः उसी नगर में आया जहां उसका विवाह राजकुमारी के साथ हुआ था। वहां उसने यज्ञ करा कर ब्राह्मणों को भोजन दक्षिण दिया। ब्राह्मणों द्वारा राजा को सूचना मिली कि काशी से एक वैश्य पुत्र आया है जो ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा दे रहा है। राजा उसे देखने के लिए गया। वहां जब राजा ने प्रत्यक्ष रूप से अपने दामाद को देखा तो उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। वह आदरपूर्वक अपने महल में उसे ले गया। कुछ दिनों तक आदर भाव करने के बाद अपनी पुत्री को बहुत सारा धन देकर विदा किया और वैश्य पुत्र अपनी पत्नी और मामा के साथ अपने नगर को चला।
जब सब लोग घर के समय पहुंचे तो उसके मामा ने कहा- तुम लोग यहीं रुको मैं घर जाकर आने की सूचना देता हूं। इधर उस बालक का पिता अपनी पत्नी सहित छत पर बैठा था और अपने मन से संकल्प कर रहा था कि यदि मेरा पुत्र काशी से लौटकर नहीं आया तो हम दोनों यही से कूद कर अपने प्राण गवा देंगे। जब लड़के के मामा ने जाकर कहा कि तुम्हारा पुत्र विद्याधन करके अपनी पत्नी को साथ लेकर कुशलपूर्वक वापस आ गया है तो माता-पिता के आनंद की सीमा न रही। उन लोगों ने अपने पुत्र और पुत्र-वधू का स्वागत किया और नियम पूर्वक सोमवार को व्रत रखकर शिवजी की पूजा करने लगा। जो व्यक्ति सोमवार को व्रत रखकर श्रद्धापूर्वक शिव पूजन करते हैं, इस कथा को पढ़ने और सुनते हैं, वह निश्चय ही सभी कष्टों से मुक्त होकर मनोवांछित फल को प्राप्त करते हैं।
प्रदोष व्रत की आरती
प्रदोष व्रत में भगवान शंकर की आरती की जाती है भगवान शंकर की आरती का लिंक नीचे हम दे रहे हैं
Panchamukhahanumat Kavacham पंचमुखहनुमत्कवचम्
प्रदोष कथा पढ़ने-सुनने के बाद पंचमुखहनुमत्कवचम् का पाठ करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।








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