श्री राधा रानी को वृषभानुसुता भी कहा जाता है, क्योंकि वे वृषभानु महाराज की पुत्री हैं। यह आरती उनकी दिव्यता, सौंदर्य और श्रीकृष्ण के प्रति उनके अविरल प्रेम का वर्णन करती है। मंदिरों और घरों में संध्या पूजा के समय यह आरती विशेष रूप से गाई जाती है, विशेषकर राधाष्टमी, वृंदावन की पूजा और कृष्ण-राधा युगल आराधना के अवसरों पर।
आरती श्री वृषभानुसुता की (सम्पूर्ण लिरिक्स)
आरती श्री वृषभानुसुता की,
मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥
त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,
विमल विवेकविराग विकासिनि ।
पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि,
सुन्दरतम छवि सुन्दरता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥
मुनि मन मोहन मोहन मोहनि,
मधुर मनोहर मूरति सोहनि ।
अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि,
प्रिय अति सदा सखी ललिता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥
संतत सेव्य सत मुनि जनकी,
आकर अमित दिव्यगुन गनकी ।
आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी,
अति अमूल्य सम्पति समता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥
। आरती श्री वृषभानुसुता की ।
कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि,
चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि ।
जगजननि जग दुखनिवारिणि,
आदि अनादिशक्ति विभुता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥
आरती श्री वृषभानुसुता की,
मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥
॥ इति श्री राधा आरती ॥
आरती का सरल अर्थ
- पहली कड़ी: श्री राधा रानी का स्वरूप अत्यंत मनमोहक है और उनका प्रेम त्रिविध तापों (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक कष्टों) का नाश करने वाला है। वे भक्तों में विवेक और वैराग्य जगाती हैं तथा श्रीकृष्ण के चरणों के प्रति सच्ची प्रीति का प्रकाश फैलाती हैं।
- दूसरी कड़ी: उनकी छवि इतनी मधुर है कि बड़े-बड़े मुनियों का मन भी मोहित हो जाता है। वे अपनी प्रिय सखी ललिता के साथ प्रेम-रस की अखंड धारा बहाती रहती हैं।
- तीसरी कड़ी: संत और मुनिजन सदा उनकी सेवा में तत्पर रहते हैं, क्योंकि वे असंख्य दिव्य गुणों की खान हैं और स्वयं श्रीकृष्ण के हृदय को आकर्षित करने वाली अमूल्य संपत्ति हैं।
- चौथी कड़ी: वे कृष्णमयी हैं, कृष्ण की नित्य सहचरी हैं, वृंदावन में विचरण करने वाली चिन्मय शक्ति हैं और समस्त जगत की माता के रूप में सबके दुखों का निवारण करती हैं।
आरती का महत्व
नियमित रूप से यह आरती करने से मन में भक्ति भाव जागृत होता है, पारिवारिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है, तथा श्री राधा रानी की कृपा से समस्त कष्टों का निवारण होता है। यह आरती विशेष रूप से राधाष्टमी, झूलनोत्सव और कार्तिक मास में की जाने वाली पूजा में गाई जाती है।
श्री राधे राधे
श्री वृषभानुसुता कौन हैं?
वृषभानुसुता का अर्थ है—वृषभानु जी की पुत्री। यह नाम श्री राधा जी के लिए प्रयोग किया जाता है।
राधा रानी की भक्ति विशेष रूप से ब्रज, वृंदावन और बरसाना की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। राधा-कृष्ण की उपासना में भक्त प्रेम, समर्पण और निष्काम भक्ति की भावना को महत्व देते हैं।
राधा जी को अनेक नामों से पुकारा जाता है, जैसे:
- राधा रानी
- श्री राधा
- वृषभानुनंदिनी
- वृषभानुसुता
- बरसाने वाली
- किशोरी जी
- राधिका
इन नामों में भक्तिभाव और प्रेम की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ दिखाई देती हैं।
आरती श्री वृषभानुसुता की का महत्व
राधा रानी की आरती का प्रमुख उद्देश्य भक्त के मन में श्रद्धा, प्रेम और समर्पण की भावना को जागृत करना है।
आरती के समय दीपक प्रज्वलित करके भगवान के स्वरूप के सामने उसे घुमाया जाता है। दीपक को प्रकाश और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
राधा रानी की आरती करते समय भक्त:
- मन को एकाग्र करने का प्रयास करता है।
- राधा-कृष्ण का स्मरण करता है।
- अपने अहंकार और नकारात्मक भावों को छोड़कर समर्पण की भावना रखता है।
- परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करता है।
- भक्ति और सद्भावना के साथ भगवान का स्मरण करता है।
आरती का वास्तविक महत्व केवल किसी विशेष भौतिक फल की प्राप्ति से नहीं, बल्कि भक्ति और ईश्वर–स्मरण की भावना से जुड़ा है।
राधा रानी की आरती करने की विधि
घर के मंदिर में राधा-कृष्ण की आरती सरल विधि से की जा सकती है।
1. पूजा स्थान को स्वच्छ करें
सबसे पहले पूजा स्थान और मंदिर को साफ करें। स्वयं भी स्नान करके या हाथ-मुंह धोकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. राधा-कृष्ण का पूजन करें
राधा-कृष्ण के विग्रह या चित्र के सामने दीपक जलाएं। अपनी श्रद्धा के अनुसार पुष्प, चंदन, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करें।
3. धूप और दीप अर्पित करें
धूप दिखाएं और उसके बाद घी या तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
4. आरती करें
श्रद्धा और प्रेम के साथ:
“आरती श्री वृषभानुसुता की…”
का पाठ करते हुए दीपक को भगवान के सामने घुमाएं।
5. प्रार्थना करें
आरती के बाद कुछ क्षण शांत होकर राधा-कृष्ण का ध्यान करें और अपने परिवार तथा सभी जीवों के कल्याण की प्रार्थना करें।
6. प्रसाद ग्रहण करें
भगवान को अर्पित नैवेद्य को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटें।
राधा रानी की आरती कब करनी चाहिए?
राधा रानी की आरती प्रातः या संध्या पूजा के समय की जा सकती है। विशेष रूप से राधा-कृष्ण मंदिरों और ब्रज की भक्ति परंपरा में आरती का विशेष महत्व है।
आप अपनी पारिवारिक पूजा-पद्धति और सुविधा के अनुसार आरती का समय निर्धारित कर सकते हैं।
राधाष्टमी, जन्माष्टमी, राधा–कृष्ण उत्सव, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव तथा अन्य वैष्णव पर्वों पर भी राधा-कृष्ण की विशेष पूजा और आरती की जाती है।
आरती के समय किन चीजों की आवश्यकता होती है?
आरती के लिए बहुत अधिक सामग्री आवश्यक नहीं है। सामान्य रूप से आप इन चीजों का प्रयोग कर सकते हैं:
- दीपक
- घी या तेल
- रुई की बाती
- धूप
- पुष्प
- अक्षत
- चंदन
- नैवेद्य या फल
- घंटी
सबसे महत्वपूर्ण चीज श्रद्धा और भक्ति है।
राधा रानी की भक्ति में नाम-स्मरण
राधा-कृष्ण भक्ति परंपरा में नाम-स्मरण का विशेष महत्व है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार राधा नाम, कृष्ण नाम या राधा-कृष्ण के नामों का जप कर सकते हैं।
नाम-स्मरण करते समय मन को शांत रखने और भगवान के स्वरूप का ध्यान करने का प्रयास किया जाता है।
आरती के बाद क्या करें?
आरती समाप्त होने के बाद दीपक की आरती श्रद्धापूर्वक ग्रहण की जा सकती है। इसके बाद भगवान को प्रणाम करके प्रसाद ग्रहण करें।
यदि परिवार के सभी सदस्य उपस्थित हों तो सभी मिलकर कुछ समय राधा-कृष्ण का नाम-स्मरण या भजन भी कर सकते हैं।







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