PrabhuPuja https://prabhupuja.com Sanatan Dharma Gyan Sat, 28 Feb 2026 14:00:37 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://prabhupuja.com/wp-content/uploads/2026/01/cropped-cropped-prabhupuja_site_icon-removebg-preview-1-32x32.png PrabhuPuja https://prabhupuja.com 32 32 214786494 श्री राम चालीसा (Shree Ram Chalisa) – संपूर्ण पाठ, विधि और लाभ https://prabhupuja.com/shree-ram-chalisa-lyrics-benefits/ https://prabhupuja.com/shree-ram-chalisa-lyrics-benefits/#respond Sun, 28 Dec 2025 17:51:35 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5278 श्री राम चालीसा (Shree Ram Chalisa) मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की स्तुति में लिखी गई 40 चौपाइयां हैं। इसका पाठ करने से मन को अपार शांति मिलती है और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। जो भक्त सच्चे मन से नित्य राम चालीसा का पाठ करते हैं, उन पर हनुमान जी और श्री राम दोनों की कृपा बनी रहती है।


श्री राम चालीसा Shri Ram Chalisa Lyrics

॥ दोहा ॥
आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनं
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं

बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्
पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं

॥ चौपाई ॥
श्री रघुबीर भक्त हितकारी ।
सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥

निशि दिन ध्यान धरै जो कोई ।
ता सम भक्त और नहिं होई ॥

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।
ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥

जय जय जय रघुनाथ कृपाला ।
सदा करो सन्तन प्रतिपाला ॥

दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।
जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ॥

तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला ।
रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥

तुम अनाथ के नाथ गोसाईं ।
दीनन के हो सदा सहाई ॥

ब्रह्मादिक तव पार न पावैं ।
सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥

चारिउ वेद भरत हैं साखी ।
तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥

गुण गावत शारद मन माहीं ।
सुरपति ताको पार न पाहीं ॥ 10 ॥

नाम तुम्हार लेत जो कोई ।
ता सम धन्य और नहिं होई ॥

राम नाम है अपरम्पारा ।
चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों ।
तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ॥

शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।
महि को भार शीश पर धारा ॥

फूल समान रहत सो भारा ।
पावत कोउ न तुम्हरो पारा ॥

भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।
तासों कबहुँ न रण में हारो ॥

नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा ।
सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥

लषन तुम्हारे आज्ञाकारी ।
सदा करत सन्तन रखवारी ॥

ताते रण जीते नहिं कोई ।
युद्ध जुरे यमहूँ किन होई ॥

महा लक्ष्मी धर अवतारा ।
सब विधि करत पाप को छारा ॥ 20 ॥

सीता राम पुनीता गायो ।
भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥

घट सों प्रकट भई सो आई ।
जाको देखत चन्द्र लजाई ॥

सो तुमरे नित पांव पलोटत ।
नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥

सिद्धि अठारह मंगल कारी ।
सो तुम पर जावै बलिहारी ॥

औरहु जो अनेक प्रभुताई ।
सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥

इच्छा ते कोटिन संसारा ।
रचत न लागत पल की बारा ॥

जो तुम्हरे चरनन चित लावै ।
ताको मुक्ति अवसि हो जावै ॥

सुनहु राम तुम तात हमारे ।
तुमहिं भरत कुल- पूज्य प्रचारे ॥

तुमहिं देव कुल देव हमारे ।
तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥

जो कुछ हो सो तुमहीं राजा ।
जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥ 30 ॥

रामा आत्मा पोषण हारे ।
जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा ।
निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥

सत्य सत्य जय सत्य- ब्रत स्वामी ।
सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।
सो निश्चय चारों फल पावै ॥

सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।
तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ॥

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा ।
नमो नमो जय जापति भूपा ॥

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।
नाम तुम्हार हरत संतापा ॥

सत्य शुद्ध देवन मुख गाया ।
बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।
तुमहीं हो हमरे तन मन धन ॥

याको पाठ करे जो कोई ।
ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥ 40 ॥

आवागमन मिटै तिहि केरा ।
सत्य वचन माने शिव मेरा ॥

और आस मन में जो ल्यावै ।
तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥

साग पत्र सो भोग लगावै ।
सो नर सकल सिद्धता पावै ॥

अन्त समय रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥

श्री हरि दास कहै अरु गावै ।
सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥

॥ दोहा ॥
सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय ।
हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ॥

राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय ।
जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय ॥

।।इतिश्री प्रभु श्रीराम चालीसा समाप्त:।।


श्री राम चालीसा पाठ के लाभ (Benefits)

  1. मानसिक शांति: प्रतिदिन पाठ करने से मानसिक तनाव दूर होता है।
  2. संकटों का नाश: प्रभु श्री राम की कृपा से जीवन के कठिन से कठिन संकट कट जाते हैं।
  3. पारिवारिक सुख: परिवार में क्लेश मिटता है और प्रेम बढ़ता है।
  4. हनुमान जी की कृपा: राम जी के भक्तों की रक्षा स्वयं हनुमान जी करते हैं।

श्री राम चालीसा पाठ करने की विधि (Vidhi)

  • समय: सर्वोत्तम समय प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त) है, परन्तु संध्या के समय भी पाठ किया जा सकता है।
  • आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके लाल या पीले आसन पर बैठें।
  • दीप: श्री राम दरबार के चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं।
  • प्रसाद: पाठ के बाद गुड़-चने या फल का भोग लगाएं।
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श्री शनि चालीसा (Shri Shani Chalisa) – साढे़ साती और ढैया से मुक्ति के लिए | Full Lyrics & Benefits https://prabhupuja.com/shani-chalisa-lyrics-benefits/ https://prabhupuja.com/shani-chalisa-lyrics-benefits/#respond Mon, 22 Dec 2025 12:18:01 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5266 भगवान शनि देव (Lord Shani) न्याय के देवता हैं। वे मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। ऐसी मान्यता है कि जिन लोगों पर शनि की ‘साढे़ साती’ (Sade Sati) या ‘ढैया’ चल रही हो, उन्हें शनिवार के दिन श्री शनि चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे शनि देव शांत होते हैं और जीवन के कष्ट कम हो जाते हैं।

श्री शनि चालीसा Shri Shani Chalisa Lyrics

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुःख दूर करि , कीजै नाथ निहाल ॥1॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु , सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय , राखहु जन की लाज ॥2॥

।। चौपाई ।।

जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छवि छाजै ॥

परम विशाल मनोहर भाला । टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
कुण्डल श्रवन चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥
पिंगल, कृष्णो, छाया, नन्दन । यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन ॥

सौरी, मन्द शनी दश नामा । भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं । रंकहुं राव करैं क्षण माहीं ॥

पर्वतहू तृण होइ निहारत । तृणहू को पर्वत करि डारत ॥
राज मिलत वन रामहिं दीन्हयो । कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥

वनहुं में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गई चुराई ॥
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा । मचिगा दल में हाहाकारा ॥

रावण की गति-मति बौराई । रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥
दियो कीट करि कंचन लंका । बजि बजरंग बीर की डंका ॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा । चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥
हार नौलखा लाग्यो चोरी । हाथ पैर डरवायो तोरी ॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो । तेलहिं घर कोल्हू चलवायो ॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों । तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी । आपहुं भरे डोम घर पानी ॥
तैसे नल पर दशा सिरानी । भूंजी-मीन कूद गई पानी ॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई । पारवती को सती कराई ॥
तनिक विकलोकत ही करि रीसा । नभ उड़ि गतो गौरिसुत सीसा ॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रोपदी होति उधारी ॥
कौरव के भी गति मति मारयो । युद्ध महाभारत करि डारयो ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला ॥
शेष देव-लखि विनती लाई । रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना । जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥
जम्बुक सिह आदि नख धारी । सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै ॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा । सिह सिद्ध्कर राज समाजा ॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥
जब आवहिं स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी ॥

तैसहि चारि चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥

समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्वसुख मंगल भारी ॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

॥ दोहा ॥

पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥

॥इति श्री शनि चालीसा॥

शनि चालीसा पाठ के लाभ (Benefits)

  1. साढे़ साती और ढैया से राहत: जिन लोगों की कुंडली में शनि भारी है, उन्हें इस पाठ से मानसिक शांति और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
  2. दुर्घटना से बचाव: शनि देव की कृपा से आकस्मिक दुर्घटनाओं और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
  3. कोर्ट-कचहरी में विजय: शनि न्याय के देवता हैं, इसलिए कानूनी मामलों में फंसे लोगों को यह पाठ अवश्य करना चाहिए।
  4. नौकरी और व्यापार: यदि कार्यक्षेत्र में बाधाएं आ रही हों, तो शनिवार को यह पाठ करने से उन्नति होती है।

पूजा विधि (How to perform Puja)

  • समय: शनिवार की शाम (सूर्यास्त के बाद)।
  • स्थान: घर का पूजा स्थल या पीपल का पेड़।
  • सामग्री: सरसों का तेल (Mustard Oil), काले तिल, काला कपड़ा और नीले फूल।
  • विशेष: पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करें।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

शनि चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?

शनिवार की शाम को सूर्यास्त के बाद पाठ करना सबसे उत्तम माना जाता है।

क्या घर के मंदिर में शनि देव की पूजा कर सकते हैं?

शनि देव की मूर्ति घर में नहीं रखनी चाहिए। आप घर में उनका मानसिक ध्यान करके या उनकी तस्वीर के सामने (आंखों में आंखें डाले बिना) पाठ कर सकते हैं, या मंदिर जाकर दीपक जलाएं।

शनि देव को खुश करने के लिए क्या दान करें?

काली उड़द, लोहा, काला कपड़ा, सरसों का तेल और जूते-चप्पल का दान करना बहुत शुभ होता है।

क्या महिलाएं शनि चालीसा पढ़ सकती हैं?

जी हाँ, महिलाएं भी शनि चालीसा का पाठ कर सकती हैं, लेकिन शनि देव की मूर्ति को स्पर्श नहीं करना चाहिए।

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श्री लक्ष्मी चालीसा (Shri Laxmi Chalisa) – सुख, समृद्धि और धन प्राप्ति के लिए | Full Lyrics & Benefits https://prabhupuja.com/laxmi-chalisa-lyrics-benefits/ https://prabhupuja.com/laxmi-chalisa-lyrics-benefits/#respond Mon, 22 Dec 2025 09:16:34 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5260 श्री लक्ष्मी चालीसा (Shri Laxmi Chalisa) – सुख, समृद्धि और धन प्राप्ति के लिए | Full Lyrics & Benefits, माँ लक्ष्मी धन, वैभव और सुख-समृद्धि की देवी हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त शुक्रवार (Friday) के दिन या दीपावली (Diwali) पर सच्चे मन से ‘श्री लक्ष्मी चालीसा’ का पाठ करते हैं, उनके घर में कभी भी धन की कमी नहीं होती। माँ लक्ष्मी की कृपा से जीवन में स्थिरता और खुशहाली आती है।

श्री लक्ष्मी चालीसा Shri Laxmi Chalisa Lyrics

।। दोहा ।।
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्घ करि, परुवहु मेरी आस॥

।। सोरठा ।।
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

।। चौपाई ।।
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही। ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही॥


तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा । सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥
ताको कोई कष्ट नोई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दजै दशा निहारी॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥

॥ दोहा॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

लक्ष्मी चालीसा पाठ के लाभ (Benefits)

  1. धन की वर्षा: माँ लक्ष्मी चंचला हैं, लेकिन चालीसा के नियमित पाठ से घर में लक्ष्मी का ‘स्थायी वास’ होता है।
  2. दरिद्रता का नाश: आर्थिक तंगी और कर्ज से मुक्ति पाने के लिए यह पाठ अचूक माना गया है।
  3. व्यवसाय में वृद्धि: अगर किसी का व्यापार मंदा चल रहा हो, तो शुक्रवार को दुकान या ऑफिस में पाठ करने से लाभ होता है।
  4. मानसिक शांति: इससे घर के क्लेश दूर होते हैं और परिवार में प्रेम बढ़ता है।

पूजा विधि (How to perform Puja)

  • दिन: शुक्रवार (Friday) या पूर्णिमा।
  • वस्त्र: स्नान करके लाल या गुलाबी वस्त्र धारण करें।
  • सामग्री: माँ लक्ष्मी की मूर्ति या फोटो के सामने घी का दीपक जलाएं। कमल का फूल और बताशे (या खीर) का भोग लगाएं।
  • प्रक्रिया: पहले श्री गणेश जी का ध्यान करें, फिर ‘श्री लक्ष्मी चालीसा’ का पाठ करें और अंत में माँ लक्ष्मी की आरती गाएं।

FAQ

लक्ष्मी चालीसा का पाठ किस दिन करना सबसे शुभ माना जाता है?

वैसे तो आप प्रतिदिन लक्ष्मी चालीसा का पाठ कर सकते हैं, लेकिन शुक्रवार (Friday) का दिन माँ लक्ष्मी को समर्पित होता है। इसलिए, हर शुक्रवार को और विशेष रूप से दीपावली या पूर्णिमा की रात को इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

मनोकामना पूर्ति के लिए लक्ष्मी चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष मनोकामना (जैसे कर्ज मुक्ति या धन लाभ) के लिए पाठ कर रहा है, तो उसे 40 दिनों तक लगातार सूर्योदय के बाद या सूर्यास्त के समय शुद्ध मन से चालीसा का पाठ करना चाहिए।

क्या लक्ष्मी चालीसा पढ़ने से आर्थिक तंगी दूर होती है?

जी हाँ, श्री लक्ष्मी चालीसा के नियमित पाठ से घर से दरिद्रता दूर होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है। ऐसा माना जाता है कि जिस घर में रोज इसका पाठ होता है, वहां माँ लक्ष्मी का स्थायी वास हो जाता है।

लक्ष्मी चालीसा के पाठ के समय माता को क्या भोग लगाना चाहिए?

माँ लक्ष्मी को सफेद और गुलाबी चीजें अति प्रिय हैं। पाठ करते समय आप खीर (Kheer), बताशे, या दूध से बनी मिठाई का भोग लगा सकते हैं। इसके अलावा, कमल का फूल अर्पित करना भी बहुत शुभ माना जाता है।

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श्री शिव चालीसा (Shri Shiv Chalisa) – पाठ, लाभ और महत्व | Complete Lyrics & Benefits https://prabhupuja.com/shiv-chalisa-lyrics-benefits/ https://prabhupuja.com/shiv-chalisa-lyrics-benefits/#respond Sun, 21 Dec 2025 10:26:10 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5253 श्री शिव चालीसा (Shri Shiv Chalisa) – पाठ, लाभ और महत्व | Complete Lyrics & Benefits, भगवान शिव (Lord Shiva) भोलेनाथ हैं, जो अपने भक्तों की पुकार बहुत जल्द सुनते हैं। ‘शिव चालीसा’ भगवान शंकर की स्तुति में रचित 40 चौपाइयां हैं। ऐसा माना जाता है कि सावन के महीने में, सोमवार को या महाशिवरात्रि के दिन शिव चालीसा का पाठ करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनचाहा वरदान प्राप्त होता है।

श्री शिव चालीसा Shri Shiv Chalisa Lyrics

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥

शिव चालीसा पाठ के लाभ (Benefits of Chanting Shiv Chalisa)

  1. मानसिक शांति (Mental Peace): शिव चालीसा के नियमित पाठ से मन की बेचैनी दूर होती है और शांति मिलती है।
  2. कष्टों से मुक्ति: भगवान शिव ‘संकट मोचन’ भी हैं; वे अपने भक्तों के दुख, दरिद्रता और रोगों का नाश करते हैं।
  3. मनोकामना पूर्ति: कहा जाता है कि 40 दिन तक लगातार श्रद्धापूर्वक पाठ करने से कठिन से कठिन कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।
  4. ग्रह दोष निवारण: कुंडली में अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए भी शिव चालीसा बहुत प्रभावी मानी जाती है।

पूजा विधि (How to Recite)

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त या शाम के समय (प्रदोष काल)।
  • आसन: कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • सामग्री: सामने शिव जी की मूर्ति या शिवलिंग रखें, जल का लोटा रखें और दीपक जलाएं।

FAQ

शिव चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

सामान्यतः एक बार, लेकिन विशेष मनोकामना के लिए 3, 5 या 11 बार पाठ किया जा सकता है।

क्या महिलाएं शिव चालीसा पढ़ सकती हैं?

जी हाँ, महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा के साथ शिव चालीसा का पाठ कर सकती हैं।

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श्री दुर्गा चालीसा (अर्थ सहित) – Shri Durga Chalisa in Hindi https://prabhupuja.com/shri-durga-chalisa-in-hindi/ https://prabhupuja.com/shri-durga-chalisa-in-hindi/#respond Tue, 02 Dec 2025 12:11:08 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5246 श्री दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की स्तुति में रचित 40 चौपाइयों का एक अत्यंत शक्तिशाली पाठ है। मान्यता है कि नवरात्रि, मंगलवार या शुक्रवार को इसका पाठ करने से जीवन के सभी संकट, शत्रु और भय दूर हो जाते हैं। माँ दुर्गा शक्ति की देवी हैं और अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।

श्री दुर्गा चालीसा

॥ दोहा ॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥ निराकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥

शशि ललाट मुख महाविशाला । नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥

॥ चौपाई ॥

तुम संसार शक्ति लै कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

रूप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा । परगट भई फाड़कर खम्बा ॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो । हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं । श्री नारायण अंग समाहीं ॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा । दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी अरु धूमावति माता । भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥

केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै । जाको देख काल डर भाजै ॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत । तिहुँलोक में डंका बाजत ॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रूप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भई सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब रहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई । जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछतायो ॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन बिलम्बा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतावें । मोह मदादिक सब बिनशावें ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥

करो कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ॥

जब लगी जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥

दुर्गा चालीसा जो नर गावै । सब सुख भोग परमपद पावै ॥

देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

श्री दुर्गा चालीसा (अर्थ सहित)

तुम संसार शक्ति लै कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ (अर्थ: आपने ही समस्त संसार की शक्ति को धारण किया हुआ है। पालन-पोषण के लिए आप ही अन्न और धन प्रदान करती हैं। आप ही अन्नपूर्णा बनकर जगत का पालन करती हैं और आप ही आदि सुन्दरी बाला (किशोरी) रूप हैं।)

प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ (अर्थ: प्रलय के समय आप ही सब कुछ नष्ट करने वाली हैं। आप भगवान शिव की प्यारी पत्नी गौरी हैं। भगवान शिव और सभी योगी आपका गुणगान करते हैं, और ब्रह्मा-विष्णु भी नित्य आपका ध्यान करते हैं।)

रूप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ धरयो रूप नरसिंह को अम्बा । परगट भई फाड़कर खम्बा ॥ (अर्थ: आपने ही सरस्वती का रूप धारण कर ऋषियों और मुनियों को सद्बुद्धि देकर उनका उद्धार किया। हे अम्बे! आपने ही नरसिंह अवतार धारण किया और खंभे को फाड़कर प्रकट हुईं।)

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो । हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं । श्री नारायण अंग समाहीं ॥ (अर्थ: आपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और हिरण्यकश्यप को मारकर उसे स्वर्ग (मोक्ष) प्रदान किया। आप ही संसार में लक्ष्मी रूप में विराजमान हैं और श्री नारायण (विष्णु) के अंग संग रहती हैं।)

क्षीरसिन्धु में करत विलासा । दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥ (अर्थ: आप क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ निवास करती हैं। हे दया की सागर! मेरी मनोकामना पूर्ण करें। हिंगलाज में भवानी के रूप में आप ही विराजमान हैं, आपकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता।)

मातंगी अरु धूमावति माता । भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥ श्री भैरव तारा जग तारिणी । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ (अर्थ: आप ही मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और सुख देने वाली बगलामुखी माता हैं। आप ही भैरवी, तारा और छिन्नमस्ता देवी हैं जो संसार के दुःखों को दूर करती हैं।)

केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ कर में खप्पर खड्ग विराजै । जाको देख काल डर भाजै ॥ (अर्थ: हे भवानी! आप सिंह (केहरि) की सवारी पर सुशोभित हैं और वीर हनुमान (लांगुर) आपकी अगुवाई करते हैं। आपके हाथों में खप्पर और तलवार है, जिसे देखकर साक्षात काल (मृत्यु) भी डरकर भाग जाता है।)

सोहै अस्त्र और त्रिशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ नगरकोट में तुम्हीं विराजत । तिहुँलोक में डंका बाजत ॥ (अर्थ: आपके पास अस्त्र और त्रिशूल शोभायमान हैं, जिससे शत्रुओं के हृदय में भय (शूल) उत्पन्न होता है। नगरकोट (कांगड़ा) में आप ही विराजमान हैं और तीनों लोकों में आपकी जय-जयकार (डंका) होती है।)

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ (अर्थ: आपने ही शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज जैसे राक्षसों का संहार किया। महिषासुर राजा बहुत अहंकारी था, जिसके पापों के भार से धरती व्याकुल हो उठी थी।)

रूप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ (अर्थ: तब आपने काली का विकराल रूप धारण किया और सेना सहित महिषासुर का नाश किया। जब-जब संतों और भक्तों पर संकट आया, तब-तब हे माता, आप उनकी सहायता के लिए प्रकट हुईं।)

अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब रहें अशोका ॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥ (अर्थ: स्वर्गलोक (अमरपुरी) और अन्य सभी लोक आपकी कृपा से शोक रहित रहते हैं। ज्वाला जी में आपकी ही ज्योति जल रही है, जहाँ नर-नारी सदा आपकी पूजा करते हैं।)

प्रेम भक्ति से जो यश गावें । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई । जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥ (अर्थ: जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाता है, दुःख और गरीबी उसके पास नहीं भटकती। जो व्यक्ति सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।)

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥ शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥ (अर्थ: योगी, देवता और मुनि पुकार कर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना योग संभव नहीं है। आदि शंकराचार्य जी ने भी आपकी तपस्या की और काम-क्रोध पर विजय प्राप्त की।)

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछतायो ॥ (अर्थ: उन्होंने केवल भगवान शंकर का ध्यान किया और आपका स्मरण नहीं किया। शक्ति के रहस्य को न समझ पाने के कारण जब उनकी शक्ति चली गई, तब वे पछताए।)

शरणागत हुई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥ भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन बिलम्बा ॥ (अर्थ: फिर उन्होंने आपकी शरण ली और आपकी कीर्ति का बखान किया, “जय जय जय जगदम्बा भवानी!” तब आप प्रसन्न हुईं और उन्हें उनकी शक्ति लौटाने में जरा भी देर नहीं की।)

मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ आशा तृष्णा निपट सतावें । मोह मदादिक सब बिनशावें ॥ (अर्थ: हे माँ! मुझे कष्टों ने चारों ओर से घेर लिया है, आपके बिना मेरे दुःख कौन हरेगा? आशा, तृष्णा और सांसारिक इच्छाएं मुझे सताती हैं; मेरे मोह और अहंकार का नाश कीजिये।)

शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ करो कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ॥ (अर्थ: हे महारानी! मेरे शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ) का नाश कीजिये, मैं एकाग्र मन से आपका स्मरण करता हूँ। हे दयालु माता! कृपा करें और मुझे ऋद्धि-सिद्धि देकर निहाल (संपन्न) करें।)

जब लगी जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥ दुर्गा चालीसा जो नर गावै । सब सुख भोग परमपद पावै ॥ (अर्थ: जब तक मैं जीवित रहूँ, आपकी दया प्राप्त करता रहूँ और सदा आपका यश सुनाता रहूँ। जो मनुष्य इस दुर्गा चालीसा को गाता है, वह सभी सुख भोगकर अंत में मोक्ष (परमपद) प्राप्त करता है।)

देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥ (अर्थ: देवीदास को अपनी शरण में जानकर, हे जगदम्बा भवानी, उस पर अपनी कृपा कीजिये।)

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श्री दुर्गा चालीसा पाठ के लाभ (Benefits)

  1. शत्रु नाश: शत्रुओं और विरोधियों पर विजय प्राप्त होती है।
  2. मानसिक शांति: मन का भय, चिंता और तनाव दूर होता है।
  3. धन लाभ: माँ लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक स्थिति सुधरती है।
  4. ग्रह शांति: राहु-केतु और शनि जैसे ग्रहों के दुष्प्रभाव कम होते हैं।
  5. रक्षा कवच: यह पाठ परिवार के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाता है।

जय माता दी! 🙏

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Sukhkarta Dukhharta Full Aarti With Lyrics https://prabhupuja.com/sukhkarta-dukhharta-full-aarti-with-lyrics/ https://prabhupuja.com/sukhkarta-dukhharta-full-aarti-with-lyrics/#respond Sun, 31 Aug 2025 10:34:11 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5216

सुखकर्ता दुखहर्ता आरती (मराठी में सबसे प्रसिद्ध)Sukhkarta Dukhharta Full Aarti With Lyrics

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची ॥

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥१॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ति ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥धृ॥

रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा ॥

हिरे जडित मुकुट शोभतो बरा ।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया ॥२॥

लंबोदर पीतांबर फनीवरवंदना ।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना ॥

दास रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सर्वांगीं ॥३॥

सुखकर्ता दुखहर्ता आरती सम्पूर्ण (मराठी में सबसे प्रसिद्ध) Sukhkarta Dukhharta Full Aarti With Lyrics Photo Image

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Pradosh Vrat Vidhi, Puja Vidhi, Katha, Rules, Aarti, Significance Pradosh Vrat Vidhi Written by Bhagwan Vedvyas भगवान वेदव्यास द्वारा रचित प्रदोष व्रत की विधि, पूजन विधि, नियम, लाभ, कथा और आरती   https://prabhupuja.com/pradosh-vrat-vidhi-puja-vidhi-katha-rules-aarti-significance-pradosh-vrat-vidhi-written-by-bhagwan-vedvyas/ https://prabhupuja.com/pradosh-vrat-vidhi-puja-vidhi-katha-rules-aarti-significance-pradosh-vrat-vidhi-written-by-bhagwan-vedvyas/#respond Thu, 21 Aug 2025 13:29:04 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5136

भगवान वेदव्यास द्वारा रचित प्रदोष व्रत की विधि, पूजन विधि, नियम, लाभ, कथा और आरती, प्रदोष व्रत की सम्पूर्ण विधि, कथा व महत्त्व का वर्णन हम यहाँ विस्तार से आपसे साझा कर रहे है। इस व्रत में प्रदोष के दिन भगवान शंकर- माता पार्वती की पूजा की जाती है। यह व्रत करने से भगवान शंकर अति प्रसन्न होते है। इस व्रत के करने से सब प्रकार के सांसारिक सुखो की प्राप्ति होती है। यह व्रत शीघ्र फलदायी होता है। इस व्रत को करने से पति-पत्नी का मन प्रसन्न रहता है, निर्धन धनवान, विद्वान, चिरायु, सौभाग्य वर्धक, विवाह संपन्न होना लाभ प्राप्त होते हैं। प्रदोष व्रत 11 या 21 प्रदोष तक करना चाहिए। इस व्रत में दिन में एक ही बार भोजन करना चाहिए।

प्रदोष व्रत की शास्त्रीय पूजा विधि Pradosh Vrat Vidhi

  1. प्रदोष व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर भगवान शंकर- माता पार्वती की पूजा करने के लिए स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। ब्रह्म मुहूर्त में उठना सबसे उत्तम होता है।
  2. पूजन सामग्री: प्रातःकाल ही भगवान शंकर- माता पार्वती की पूजा के लिए सामग्री तैयार कर ले। पूजा के लिये शुद्ध जल, चावल, पुष्प, फूल माला, फल, मिठाई(प्रसाद), अष्टगंध चन्दन, रोली, धूप, दीप, लौंग, इलायची, गंगाजल, पान, सुपारी, घी, कपूर, मोली(कलेवा या लच्छा), रुई, बिल्वपत्र, रुपए और ताम्बे का कलश की आवश्यकता होती है।
  3. पूजन का समय: संध्या के समय प्रदोष काल में(शाम को) शुभ मुहर्त में भगवान शंकर- माता पार्वती का पूजन कर लेना चाहिए। स्फटिक शिवलिंग की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
  4. मंत्र जाप: पूजा के समय नमः शिवाय मंत्र का जाप करते रहे।
  5. पूजन में स्फटिक शिवलिंग का पूजन किया जाता है।
  6. प्रदोष व्रत में बिना नमक का भोग लगाकर व्रत खोलने पर उसका सेवन करना चाहिए। दिन और रात में केवल एक समय ही भोजन ग्रहण करे। शाम के समय पूजन के उपरान्त किसी भी समय भोजन किया जा सकता है।
  7. हवन आहुति भी देना चाहिये। मंत्र (ॐ हीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा) से आहुति देना चाहिए।
  8. पूजन के अंत में भगवान शंकर की आरती जरूर करें।
  9. प्रदोष पूजन के पश्यात प्रदोष व्रत कथा सुननी चाहिए।
  10. प्रदोष कथा पढ़ने-सुनने के बाद पंचमुखहनुमत्कवचम्, श्री गणाधिपति स्तोत्र  का पाठ करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।

प्रदोष व्रत के नियम Pradosh Vrat Rules

  1. किसी भी व्रत के सफल होने की संभावना तभी होती है, जब वह व्रत पूरे श्रद्धा भाव से और पवित्रता से किया जाए, बिना भाव और खिन्नता से व्रत करना कभी भी फलदायक नहीं होता है।
  2. त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत को किया जाता है और शुरू करने के पूर्व 11 या 21 प्रदोष व्रत करने का संकल्प लेना होता है।
  3. इस व्रत को स्त्री, पुरुष, बाल-वृद्ध कोई भी कर सकता है।
  4. व्रत के दिन सुबह से ही “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप मन ही मन करना चाहिए।
  5. यह व्रत अपने ही घर पर करना चाहिए, यदि प्रदोष के दिन आप यात्रा या प्रवास पर हो तो वह प्रदोष छोड़ कर अगले प्रदोष को व्रत करना चाहिए।
  6. संकल्प के 11 या 21 प्रदोष पुरे होने पर रीति अनुसार उद्यापन अवश्य करना चाहिए।
  7. व्रत पूरा होने पर उद्यापन में कम से कम 7 ब्राह्मण दम्पति को भोजन कराए।
  8. व्रत के दिन अगर स्त्री रजस्वला हो या घर में सूतक हो तो उस प्रदोष को स्त्री व्रत ना करे।

प्रदोष व्रत के लाभ/महत्त्व Pradosh Vrat Significance

  1. जिस भी मनोकामना से व्रत प्रारंभ किया जाता है, वह मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
  2. संतानहीन को श्रेष्ठ संतान प्राप्त होती है।
  3. सौभाग्यशाली स्त्री का सौभाग्य अखंड रहता है।
  4. कुंवारे लड़के व लड़की को मनभावन जीवनसाथी प्राप्त होता है।
  5. व्रत को करने से सभी प्रकार की विपत्तियां दूर होती है।
  6. सूतजी कहते है कि प्रदोष व्रत करने वाले को सौ गायो के दान का फल प्राप्त होता है।

प्रदोष वार परिचय Pradosh Vrat Days Type

रवि प्रदोष:- आयु आरोग्यता के लिए रवि प्रदोष करना चाहिए ।

सोम प्रदोष:- अभीष्ट सिद्धि हेतु सोम प्रदोष व्रत करें ।

मंगल प्रदोष:- रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य हेतु मंगल प्रदोष व्रत करें ।

बुध प्रदोष:- सर्व कामना सिद्धि के लिए बुध प्रदोष व्रत करें।

 बृहस्पति प्रदोष:- शत्रु विनाश के लिए बृहस्पति प्रदोष करें ।

शुक्र प्रदोष:- सौभाग्य और स्त्री की समृद्धि के लिए शुक्र प्रदोष करें ।

शनि प्रदोष:- संतान प्राप्ति हेतु शनि प्रदोष व्रत करें।

प्रदोष व्रत की कथा निसंतान वैश्य की कथा (सोम प्रदोष व्रत कथा)

एक समय सभी प्राणियों के निहितार्थ परम पवित्र भागीरथी के तट पर ऋषि समाज द्वारा विशाल गोष्ठी का आयोजन किया गया। विज्ञ महर्षियो की एकत्रित सभा में व्यास जी के परम शिष्य पुराण वेता सूत जी हरि कीर्तन करते हुए पधारे, सूत जी को देखते ही शौनकादी अठ्यासी हजार मुनियों ने दंडवत प्रणाम किया। महा ज्ञानी सूत जी ने भक्ति भाव से ऋषियों को हृदय से लगाया तथा आशीर्वाद दिया। विद्वान ऋषि गण और सब शिष्य आसनों पर विराजमान हो गए।

मुनी गण विनीत भाव से पूछने लगे कि है परम दयालू ! कलीकाल में शंकर जी की भक्ति किस आराधना द्वारा उपलब्ध होगी, हम लोगों को बताने की कृपा कीजिए, क्योंकि कलयुग के सभी प्राणी पाप कर्म में रत होकर वेद शास्त्रों से विमुख रहेंगे। दीन जन अनेको संकटो से त्रस्त रहेंगे। हे मुनि श्रेष्ठ कली काल में सत्कर्म की ओर किसी की रुचि न होगी। जब पुण्य शीर्ण हो जाएंगे तो मनुष्य की बुद्धि असत्य कर्मों की ओर प्रेरित होगी, जिससे दुर्विचारी पुरुष वंश सहित समाप्त हो जाएंगे।

इस अखिल भूमंडल पर जो मनुष्य ज्ञानी होकर ज्ञान की शिक्षा नहीं देता, उससे परमपिता परमेश्वर कभी प्रसन्न नहीं होते हैं। हे महा मुनि ऐसा कौन सा उत्तम व्रत है, जिससे मनवांछित फल की प्राप्ति होती है, कृपा कर बतलाइए। ऐसा सुनकर दयालु ह्रदय श्री सूत जी कहने लगे श्रेष्ठ मुनियों तथा शौनक जी आप धन्यवाद के पात्र हैं, आपके विचार सराहनीय एवं प्रशंसनीय है। आप वैष्णवो में अग्रगण्य है, क्योंकि आपके हृदय में सदा परहित की भावना रहती है, इसलिए है शोनकादि ऋषियों सुनो, मैं उस व्रत को तुमसे कहता हूं जिसके करने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं, धन वृद्धि कारक, दुख विनाशक, सुख प्राप्त करने वाला, संतान देने वाला, मनवांछित फल प्राप्ति करने वाला यह व्रत तुमको सुनाता हूं। जो किसी समय भगवान शंकर ने सती जी को सुनाया था और उनसे प्राप्त यह परम श्रेष्ठ उपदेश मेरे पूज्य गुरु जी ने मुझे सुनाया था। जिसे आपको समय पाकर शुभ वेला में मैं सुनाता हूं। बोलो उमापति महादेव की जय।

सूतजी कहने लगे आयु वृद्धि, स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रदोष का व्रत करें।

इसकी विधि इस प्रकार है प्रातः स्नान कर निराहार रहकर शिवजी के ध्यान में मग्न हो शिव मंदिर में जाकर शंकर जी की पूजा करें। पूजा के पश्चात अर्धपुंड त्रिपुंड का तिलक धारण करें, बेलपत्र चढ़ाये। धुप, दीप, अक्षत से पूजा करें, ऋतु फल चढ़ाए (ओम नमः शिवाय) मंत्र का रुद्राक्ष माला से जप करें, ब्राह्मण को भोजन करा सामर्थ के अनुसार दक्षिण दे। तत्पश्यात मौन व्रत धारण करें, व्रती को सत्य भाषण करना आवश्यक है, हवन आहुति भी देना चाहिये। मंत्र (ॐ हीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा) से आहुति देना चाहिए। इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। व्रती पृथ्वी पर शयन करें, एक बार भोजन करें, इससे सर्वे कार्य सिद्ध होते हैं, श्रावण मास में तो इसका विशेष महत्व है। यह सर्व सुख, धन, आरोग्यता देने वाला होता है, यह व्रत इन सब मनोरथो को पूर्ण करता है। हे ऋषिवरो यह प्रदोष व्रत जो मैंने आपको बताया किसी समय शंकर जी ने सतीजी को और वेदव्यास मुनि जी ने मुझको सुनाया था।

शौनकादि ऋषि बोले- हे पूज्यवर महामते आपने यह व्रत परम गोपनीय, मंगलप्रद, कष्ट निवारक बतलाया है, कृपया यह बताने का कष्ट करें की यह व्रत किसने किया और उसे क्या फल प्राप्त हुआ?

सूत जी बोले हे विचारवान ज्ञानियों आप शिव के परम भक्त हैं, आपकी भक्ति देखकर में व्रती पुरुषों की कथा कहता हूं। प्राचीन समय में किसी नगर में एक वैश्य रहता था। वह वैश्य बहुत ही धनी था। उसे किसी बात का कष्ट न था। परंतु उसके पास विशाल वैभव होते हुए भी उसे कोई संतान न थी। जिसके कारण वैश्य हमेशा दुखी रहता था। वह वैश्य भगवान शिव का अनन्य उपासक था। प्रत्येक सोमवार को वह शिवजी की पूजा तथा व्रत किया करता था। सोमवार के दिन सांय काल वह शिव मंदिर में दीपक जलाता तथा उन्हें अनेक प्रकार के व्यंजन समर्पित करता था। इसके बाद पत्नी सहित भगवान का प्रसाद ग्रहण करता था।

उस वैश्य के भक्ति भाव को देखकर पार्वती दयाद्र हो गई और शिवजी से बोली हे शिवजी, यह वैश्य प्रति सोमवार को आपका पूजन कितनी श्रद्धा से करता है, आप इसकी संतानहीनता दूर क्यों नहीं करते हैं? पार्वती जी की बात सुनकर शिवजी ने कहा- ‘हे देवी इस वैश्य को संतान का न होना इसके पूर्व जन्मों का फल है और वह अपने कर्मों का फल भुगत रहा है।’ पार्वती जी ने कहा- हे भगवन यदि आप अपने भक्तों का कष्ट दूर नहीं करेंगे तो भक्तजन आपकी पूजा आराधना करेंगे। इसलिए आप उसे अवश्य ही पुत्रवान बनाइये। पार्वती जी के उत्तर से शिव जी ने कहा- ‘हे देवी मैं तुम्हारे आग्रह से उसे पुत्र प्राप्ति का वर देता हूं, परंतु उसके भाग्य में पुत्र-सुख न होने से वह पुत्र केवल 12 वर्ष तक की जीवित रह सकेगा।

कुछ काल के अनन्तर भगवान शिव की कृपा से वैश्य पत्नी गर्भवती हुई और दसवे मास में उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र उन्नत होने से वैश्य के घर में अत्यंत आनंद मनाया गया, परंतु फिर भी वह वैश्य निश्चिन्त न हो सका। क्योंकि वह जानता था कि यह पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही मेरे साथ रहेगा। इस प्रकार आनंद मंगल में 11 वर्ष का समय बीत गया।

एक दिन उसकी माता ने पति से पुत्र विवाह के लिए आग्रह किया। वैश्य ने अपनी पत्नी से कहा- ‘अभी विवाह की क्या चिंता है, अभी तो मैं इसे काशी में विद्या अध्ययन के लिए भेजना चाहता हूं।’ पत्नी से ऐसा कहकर उस वैश्य ने लड़के के मामा को बुलाया और उसे बहुत धन देकर कहा- ‘तुम अपने इस भांजे को पढ़ने के लिए काशी में ले जाओ। परन्तु एक बात ध्यान रखना कि मार्ग में ब्राह्मण को भोजन-दक्षिणा देते तथा यज्ञ करते हुए जाना।’ इस प्रकार घर से वे दोनों विदा होकर रास्ते में ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा देते हुए तथा यज्ञ करते हुए एक नगरी में पहुंच गए। संयोग से उस नगर के राजा की कन्या का विवाह उसी दिन था। कन्या अत्यंत सुन्दर और सुलक्षणा थी।

परंतु जिस राजकुमार से विवाह होने वाला था वह एक आंख का काना था, वर के पिता को यह बात की बहुत चिंता थी। जब उसने वैश्य के सुंदर पुत्र को देखा तो उसने उसके मामा से कहा- ‘यदि आप अपने भांजे को कुछ समय के लिए मुझे दे देवे तो, आपकी बड़ी कृपा होगी। विवाह के पश्यात मैं इसे आपके पास वापस भेज दूंगा और आपको बहुत सा धन दूंगा। लड़के के मामा ने अपने भांजे को नकली वर बनाकर विवाह मंडप में भेज दिया। विवाह कार्य विधिवत संपन्न हुआ। परंतु जब वैश्य पुत्र सिंदूरदान करके वापस लौटने लगा तो उसने राजकुमारी की साड़ी के एक छोर पर लिख दिया कि- ‘है प्रिय तुम्हारा विवाह मुझ वैश्य पुत्र के साथ हुआ है। अब मैं पढ़ने के लिए काशी जा रहा हूं। अब तुम्हें एक नकली वर के साथ विदा होना पड़ेगा, जो कि एक आंख का काना है और तुम्हारा पति नहीं है। इतना लिखकर वह वैश्य पुत्र चला गया।

विदाई के समय जब राजकुमारी ने अपनी साड़ी पर वैश्य पुत्र द्वारा लिखित बात पड़ी तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और उत्तर में कहा- ‘यह मेरा पति नहीं है मेरा पति तो वैश्या पुत्र है जो इस समय पढ़ने के लिए काशी चला गया है।’ राजकुमारी की बात सुनकर उसके माता-पिता बहुत ही सोच में पड़ गए और वर के पिता द्वारा किए गए छल से दुखी हुए और कन्या को विदा न किया। बारात खाली हाथ वापस लौट गई। उधर वे दोनों वैश्य काशी पहुंच गए। वहां जाकर वैश्य पुत्र विद्या अध्ययन तथा उसका मामा यज्ञ संपादन में लगा। इस प्रकार कुछ ही दिनों बाद उस लड़के के 12 वर्ष पूरे हो गए उस दिन यज्ञ हो रहा था। लड़के ने अपने मामा से कहा- ‘आज मेरी तबीयत ठीक नहीं जान पड़ रही है।इसलिए मैं सोने के लिए जा रहा हूं।’ ऐसा कह कर वह लड़का चला गया। थोड़ी देर बाद आकर जब मामा ने देखा तो अपने भांजे को मृत अवस्था में पाया। जिससे वह बहुत दुखी हुआ। परंतु उधर यज्ञ कार्य चल रहा था, इसलिए यज्ञ भंग होने की वजह से मोन ही रहा। जब यज्ञ की पूर्णाहुति हो गई और सभी ब्राह्मण वहां से चले गए तो वह जोरों से विलाप करने लगा।

उसी समय देव योग से पार्वती जी के साथ शिवजी उधर से निकल रहे थे। उस विलाप को सुनकर पार्वती का मन दयाद्र हो उठा और वह शिवजी से बोली- ‘हे भगवन इतना करुण क्रंदन कौन कर रहा है? आप वहां चलकर देखिए कि उसके रोने का क्या कारण है? पार्वती जी के आग्रह से शिवजी उस स्थान पर गए। वहां पहुंचकर पार्वती जी ने उस बालक को पहचान लिया और कहा- ‘हे भगवन आपके वरदान से उत्पन्न बालक मृत हो चुका है। इसका क्या कारण है शिवजी बोले- ‘हे देवी यह बालक अपनी पूरी आयु समाप्त कर चुका है और अब मृत्यु को प्राप्त हो गया है इसमें मैं क्या कर सकता हूं?

पार्वती जी ने कहा- ‘हे शिवजी आपने जिस प्रकार कृपा करके इसे 12 वर्ष की आयु दी थी। उसी प्रकार अनुग्रह करके इसे जीवन की पूरी आयु प्रदान कीजिए, नहीं तो वह वैश्य इसके वियोग में अपने प्राण छोड़ देगा। पार्वती जी के आग्रह से शिवजी ने उसे बालक को जीवन दान दिया और स्वयं पार्वती सहित शिवलोक को चले गए। इधर शिव जी के वरदान को पाकर वह बालक जी उठा और कुछ दिनों के बाद अपने मामा के साथ अपने नगर को प्रस्थान किया।

वहां से चलकर पुनः उसी नगर में आया जहां उसका विवाह राजकुमारी के साथ हुआ था। वहां उसने यज्ञ करा कर ब्राह्मणों को भोजन दक्षिण दिया। ब्राह्मणों द्वारा राजा को सूचना मिली कि काशी से एक वैश्य पुत्र आया है जो ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा दे रहा है। राजा उसे देखने के लिए गया। वहां जब राजा ने प्रत्यक्ष रूप से अपने दामाद को देखा तो उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। वह आदरपूर्वक अपने महल में उसे ले गया। कुछ दिनों तक आदर भाव करने के बाद अपनी पुत्री को बहुत सारा धन देकर विदा किया और वैश्य पुत्र अपनी पत्नी और मामा के साथ अपने नगर को चला।

जब सब लोग घर के समय पहुंचे तो उसके मामा ने कहा- तुम लोग यहीं रुको मैं घर जाकर आने की सूचना देता हूं। इधर उस बालक का पिता अपनी पत्नी सहित छत पर बैठा था और अपने मन से संकल्प कर रहा था कि यदि मेरा पुत्र काशी से लौटकर नहीं आया तो हम दोनों यही से कूद कर अपने प्राण गवा देंगे। जब लड़के के मामा ने जाकर कहा कि तुम्हारा पुत्र विद्याधन करके अपनी पत्नी को साथ लेकर कुशलपूर्वक वापस आ गया है तो माता-पिता के आनंद की सीमा न रही। उन लोगों ने अपने पुत्र और पुत्र-वधू का स्वागत किया और नियम पूर्वक सोमवार को व्रत रखकर शिवजी की पूजा करने लगा। जो व्यक्ति सोमवार को व्रत रखकर श्रद्धापूर्वक शिव पूजन करते हैं, इस कथा को पढ़ने और सुनते हैं, वह निश्चय ही सभी कष्टों से मुक्त होकर मनोवांछित फल को प्राप्त करते हैं।

प्रदोष व्रत की आरती

प्रदोष व्रत में भगवान शंकर की आरती की जाती है भगवान शंकर की आरती का लिंक नीचे हम दे रहे हैं

भगवान शंकर की आरती

Panchamukhahanumat Kavacham पंचमुखहनुमत्कवचम्

प्रदोष कथा पढ़ने-सुनने के बाद पंचमुखहनुमत्कवचम्  का पाठ करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।

पंचमुखहनुमत्कवचम् के लिये क्लिक करे

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Panchmukhi Hanuman Kavach पंचमुखहनुमत्कवचम् https://prabhupuja.com/panchmukhi-hanuman-kavach-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a5%8d/ https://prabhupuja.com/panchmukhi-hanuman-kavach-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a5%8d/#respond Sun, 17 Aug 2025 07:40:55 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5169 पंचमुखी हनुमान जी का स्वरूप पाँच चेहरों के साथ शक्ति, साहस और रक्षा का प्रतीक माना जाता है। हनुमान जी को शक्ति, भक्ति और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। उनके अनगिनत रूपों में पंचमुखी हनुमान का स्वरूप अत्यंत विशेष है। यह रूप भगवान के पाँच मुखों का संगम है और इसका स्मरण अथवा पूजा भक्त को अदृश्य शक्तियों से रक्षा प्रदान करता है। इसी रूप से जुड़ा हुआ है पंचमुखी हनुमान कवच, जो साधारण स्तोत्र नहीं बल्कि आध्यात्मिक कवच है।

पंचमुखी हनुमान के पाँच मुख

  1. हनुमान (पूर्व दिशा) – भक्ति, बल और साहस का वरदान।
  2. नरसिंह (दक्षिण दिशा) – भय, शत्रु और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा।
  3. गरुड़ (पश्चिम दिशा) – विष, जादू-टोना और ग्रहबाधा से मुक्ति।
  4. वराह (उत्तर दिशा) – पृथ्वी की रक्षा एवं शाप से मुक्ति।
  5. हयग्रीव (ऊपर की दिशा) – ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक तेज की प्राप्ति।

पंचमुखी हनुमान कवच की विशेषता

  • यह केवल स्तोत्र नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक कवच है।
  • इसे पढ़ने मात्र से नहीं, बल्कि पूजन और साधना में इसका उपयोग करने से अत्यधिक शक्ति मिलती है।
  • माना जाता है कि इसका पाठ अथवा ध्यान साधक को अदृश्य शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है और शत्रुओं पर विजय दिलाता है।

श्रीगणेशाय नमः ।

ॐ श्री पञ्चवदनायाञ्जनेयाय नमः । ॐ अस्य श्री
पञ्चमुखहनुमन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः ।

गायत्रीछन्दः । पञ्चमुखविराट् हनुमान्देवता । ह्रीं बीजं ।
श्रीं शक्तिः । क्रौं कीलकं । क्रूं कवचं । क्रैं अस्त्राय फट् ।
इति दिग्बन्धः ।

श्री गरुड उवाच ।

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रृणुसर्वाङ्गसुन्दरि ।
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम् ॥ १॥

पञ्चवक्त्रं महाभीमं त्रिपञ्चनयनैर्युतम् ।
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम् ॥ २॥

पूर्वं तु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
दन्ष्ट्राकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम् ॥ ३॥

अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम् ।
अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम् ॥ ४॥

पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम् ॥

सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ॥ ५॥

उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम् ।
पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम् ॥ ६॥

ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम् ।
येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यं महासुरम् ॥ ७॥

जघान शरणं तत्स्यात्सर्वशत्रुहरं परम् ।
ध्यात्वा पञ्चमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ॥ ८॥

खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशमङ्कुशपर्वतम् ।
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम् ॥ ९॥

भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुङ्गवम् ।
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम् ॥ १०॥

प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम् ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥ ११॥

सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम् ।
पञ्चास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं
शशाङ्कशिखरं कपिराजवर्यम ।
पीताम्बरादिमुकुटैरूपशोभिताङ्गं
पिङ्गाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ॥ १२॥

मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम् ।
शत्रु संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ॥ १३॥

ॐ हरिमर्कट मर्कट मन्त्रमिदं
परिलिख्यति लिख्यति वामतले ।
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं
यदि मुञ्चति मुञ्चति वामलता ॥ १४॥

ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय पूर्वकपिमुखाय
सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय
नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय पश्चिममुखाय गरुडाननाय
सकलविषहराय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनायोत्तरमुखायादिवराहाय
सकलसम्पत्कराय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनायोर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय
सकलजनवशङ्कराय स्वाहा ।

ॐ अस्य श्री पञ्चमुखहनुमन्मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र
ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । पञ्चमुखवीरहनुमान् देवता ।

हनुमानिति बीजम् । वायुपुत्र इति शक्तिः । अञ्जनीसुत इति कीलकम् ।
श्रीरामदूतहनुमत्प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
इति ऋष्यादिकं विन्यसेत् ।

ॐ अञ्जनीसुताय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ पञ्चमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ।

ॐ अञ्जनीसुताय हृदयाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुपुत्राय शिखायै वषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय कवचाय हुम् ।
ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ पञ्चमुखहनुमते अस्त्राय फट् ।
पञ्चमुखहनुमते स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

अथ ध्यानम् ।

वन्दे वानरनारसिंहखगराट्क्रोडाश्ववक्त्रान्वितं
दिव्यालङ्करणं त्रिपञ्चनयनं देदीप्यमानं रुचा ।
हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भाङ्कुशाद्रिं हलं
खट्वाङ्गं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम् ।

अथ मन्त्रः ।

ॐ श्रीरामदूतायाञ्जनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्रमाय
सीतादुःखनिवारणाय लङ्कादहनकारणाय महाबलप्रचण्डाय
फाल्गुनसखाय कोलाहलसकलब्रह्माण्डविश्वरूपाय
सप्तसमुद्रनिर्लङ्घनाय पिङ्गलनयनायामितविक्रमाय
सूर्यबिम्बफलसेवनाय दुष्टनिवारणाय दृष्टिनिरालङ्कृताय
सञ्जीविनीसञ्जीविताङ्गदलक्ष्मणमहाकपिसैन्यप्राणदाय
दशकण्ठविध्वंसनाय रामेष्टाय महाफाल्गुनसखाय सीतासहित-
रामवरप्रदाय षट्प्रयोगागमपञ्चमुखवीरहनुमन्मन्त्रजपे विनियोगः ।

ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बंबंबंबंबं वौषट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फंफंफंफंफं फट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेंखेंखेंखेंखें मारणाय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धंधंधंधंधं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा ।
ॐ टंटंटंटंटं कूर्ममूर्तये पञ्चमुखवीरहनुमते
परयन्त्रपरतन्त्रोच्चाटनाय स्वाहा ।

ॐ कंखंगंघंङं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं
तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवं शंषंसंहं
ळंक्षं स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

ॐ पूर्वकपिमुखाय पञ्चमुखहनुमते टंटंटंटंटं
सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा ।

ॐ दक्षिणमुखाय पञ्चमुखहनुमते करालवदनाय नरसिंहाय
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः सकलभूतप्रेतदमनाय स्वाहा ।
ॐ पश्चिममुखाय गरुडाननाय पञ्चमुखहनुमते मंमंमंमंमं
सकलविषहराय स्वाहा ।

ॐ उत्तरमुखायादिवराहाय लंलंलंलंलं नृसिंहाय नीलकण्ठमूर्तये
पञ्चमुखहनुमते स्वाहा ।

ॐ उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुंरुंरुंरुंरुं रुद्रमूर्तये
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ।

ॐ अञ्जनीसुताय वायुपुत्राय महाबलाय सीताशोकनिवारणाय
श्रीरामचन्द्रकृपापादुकाय महावीर्यप्रमथनाय ब्रह्माण्डनाथाय
कामदाय पञ्चमुखवीरहनुमते स्वाहा ।

भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिन्यन्तरिक्षग्रह-
परयन्त्रपरतन्त्रोच्चटनाय स्वाहा ।
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय पञ्चमुखवीरहनुमते
श्रीरामचन्द्रवरप्रसादाय जंजंजंजंजं स्वाहा ।
इदं कवचं पठित्वा तु महाकवचं पठेन्नरः ।
एकवारं जपेत्स्तोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम् ॥ १५॥

द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ।
त्रिवारं च पठेन्नित्यं सर्वसम्पत्करं शुभम् ॥ १६॥

चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम् ।
पञ्चवारं पठेन्नित्यं सर्वलोकवशङ्करम् ॥ १७॥

षड्वारं च पठेन्नित्यं सर्वदेववशङ्करम् ।
सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् ॥ १८॥

अष्टवारं पठेन्नित्यमिष्टकामार्थसिद्धिदम् ।
नववारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्नुयात् ॥ १९॥

दशवारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानदर्शनम् ।
रुद्रावृत्तिं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ॥ २०॥

निर्बलो रोगयुक्तश्च महाव्याध्यादिपीडितः ।
कवचस्मरणेनैव महाबलमवाप्नुयात् ॥ २१॥

॥ इति श्रीसुदर्शनसंहितायां श्रीरामचन्द्रसीताप्रोक्तं
श्रीपञ्चमुखहनुमत्कवचं सम्पूर्णम् ॥

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April Month Festivals Vrat Tyohar अप्रैल माह के हिंदू व्रत-त्यौहार https://prabhupuja.com/april-month-festivals-vrat-tyohar/ https://prabhupuja.com/april-month-festivals-vrat-tyohar/#respond Wed, 26 Mar 2025 06:58:13 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5108 April Month Festivals Vrat Tyohar अप्रैल माह में आने वाले व्रत-त्यौहारों की लिस्ट जैसे श्री रामनवमी, कामदा एकादशी, महावीर स्वामी जयंती, प्रदोष व्रत, हनुमान जन्मोत्सव, मेला सालासर बालाजी, चैत्र पूर्णिमा व्रत, वरुथिनी एकादशी और परशुराम जयंती तक हम आपसे यहां साझा कर रहे हैं। यह चैत्र माह है जिसमे भगवान राम की पूजा की जाती है, क्योकि इसी माह में रामनवमी का पर्व पूरे देश में मनाया जाता है।

अप्रैल माह के व्रत-त्यौहार(विक्रम संवत 2081-82, चैत्र शुक्ल चतुर्थी से वैशाख शुक्ल तृतीया तक)

DateHindu DateDayHindu Festival
01 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल चतुर्थी मंगलवार मासिक विनायक चतुर्थी
02 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल पंचमीबुधवारडोलोत्सव, लक्ष्मी पंचमी
03 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल षष्टी गुरुवारयमुना छठ, यमुना जयंती, स्कन्दा षष्टी, रामानुजाचार्य जयंती
04 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल सप्तमी शुक्रवारदुर्गा पूजा प्रारम्भ (बंगाल)
05 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल अष्टमीशनिवारमासिक दुर्गाष्टमी,
06 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल नवमी रविवारचैत्र नवरात्री पूर्ण, श्री रामनवमी, स्वामीनारायण जयंती, तारा जयंती
07 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल दशमी सोमवारधर्मराज दशमी, नवरत्रोतापन
08 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल एकादशीमंगलवारकामदा एकादशी
09 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल द्वादशीबुधवारवामन द्वादशी, मदन द्वादशी
10 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल त्रयोदशीगुरुवारमहावीर स्वामी जयंती, प्रदोष व्रत
11 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल चतुर्दशीशुक्रवारहनुमान जन्मोत्सव उपवास, ज्योतिबा फुले जयंती
12 अप्रैल 2025चैत्र शुक्ल पूर्णिमाशनिवारहनुमान जन्मोत्सव, मेला सालासर बालाजी, चैत्र पूर्णिमा व्रत, सत्यव्रत, वैशाख स्नान प्रारम्भ
13 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण प्रतिपदारविवारश्री एकलिंग जी पाटोत्सव
16 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण तृतीयामंगलवारसंकट चतुर्थी
20 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण सप्तमीरविवार कालाष्टमी
24 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण एकादशीगुरुवारवरुथिनी एकादशी
25 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण द्वादशीशुक्रवारप्रदोष व्रत
26 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण त्रयोदशी/ चतुर्दशीशनिवारमासिक शिवरात्रि व्रत
27 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण अमावस्यारविवारवैशाख देवपितृकार्य अमावस्या
29 अप्रैल 2025वैशाख शुक्ल द्वितीयामंगलवारपरशुराम जयंती
30 अप्रैल 2025वैशाख शुक्ल तृतीयाबुधवारअक्षय तृतीया(आखातीज), मासिक विनायक चतुर्थी, रोहिणी व्रत, बद्रीनाथ केदारनाथ यात्रा प्रारम्भ
March Month Festivals Vrat Tyohar

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Bhagwan Kailashwasi Ki Aarti Lyrics in Hindi | भगवान् कैलासवासी की सम्पूर्ण आरती हिंदी में  https://prabhupuja.com/bhagwan-kailashwasi-ki-aarti-lyrics-in-hindi/ https://prabhupuja.com/bhagwan-kailashwasi-ki-aarti-lyrics-in-hindi/#respond Sat, 30 Nov 2024 02:42:39 +0000 https://prabhupuja.com/?p=5024 भगवान् कैलासवासी की सम्पूर्ण आरती हिंदी में  | Bhagwan Kailashwasi Ki Aarti Lyrics in Hindi, Arati Bhagavana Kailasavasi, kailashwasi shankar ji ki aarti

भगवान् कैलासवासी की सम्पूर्ण आरती हिंदी में पूरी Bhagwan Kailashwasi Ki Aarti Lyrics in Hindi Full

शीश गंग अर्धंग पार्वती
सदा विराजत कैलासी।
नंदी भृंगी नृत्य करत हैं,
धरत ध्यान सुर सुखरासी।।
शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह,
बैठे हैं शिव अविनाशी।
करत गान गन्धर्व सप्त स्वर,
राग रागिनी मधुरासी।।

यक्षरक्षभैरव जहं डोलत,
बोलत हैं वनके वासी।
कोयल शब्द सुनावत सुन्दर,
भ्रमर करत हैं गुंजा-सी।।
कल्पद्रुम अरु पारिजात तरु,
लाग रहे हैं लक्षासी।
कामधेनु कोटिन जहं डोलत,
करत दुग्ध की वर्षा-सी।।
सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित,
चन्द्रकान्त सम हिमराशी।
नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित,
सेवत सदा प्रकृति दासी।।

ऋषिमुनि देव दनुज नित सेवत,
गान करत श्रुति गुणराशी।
ब्रह्मा-विष्णु निहारत निसिदिन,
कछु शिव हमकूं फरमासी।।
ऋद्धि-सिद्धि के दाता शंकर,
नित सत् चित् आनंदराशी।
जिनके सुमिरत ही कट जाती,
कठिन काल यम की फांसी।।
त्रिशूलधरजी का नाम निरंतर,
प्रेम सहित जो नर गासी।
दूर होय विपदा उस नर की,
जन्म-जन्म शिवपद पासी।।
कैलासी काशी के वासी,
विनाशी मेरी सुध लीजो।
सेवक जान सदा चरनन को,
अपनो जान कृपा कीजो।।
तुम तो प्रभुजी सदा दयामय,
अवगुण मेरे सब ढकियो।
सब अपराध क्षमा कर शंकर,
किंकर की विनती सुनियो।।

जय जय कैलाशपति की जय।।

भगवान् कैलासवासी की आरती संपूर्ण।।

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