PrabhuPuja | अपडेट: 30 अक्टूबर 2026
अहोई अष्टमी माताओं का वह व्रत है जो संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। इस साल यह व्रत रविवार, 1 नवंबर 2026 को है। इस लेख में आपको व्रत की तारीख, पूजा का मुहूर्त, तारों को अर्घ्य देने का समय, पूजा सामग्री, पूरी पूजा विधि, व्रत कथा और ज़रूरी नियम एक ही जगह मिलेंगे।
अहोई अष्टमी 2026 – एक नज़र में
| विवरण | जानकारी (दिल्ली-NCR के अनुसार) |
|---|---|
| तारीख | रविवार, 1 नवंबर 2026 |
| तिथि | कार्तिक कृष्ण अष्टमी |
| अष्टमी तिथि शुरू | 1 नवंबर, दोपहर 2:51 बजे |
| अष्टमी तिथि समाप्त | 2 नवंबर, दोपहर 1:10 बजे |
| पूजा का शुभ मुहूर्त | शाम 5:37 से 6:55 बजे तक (1 घंटा 18 मिनट) |
| तारे दिखने का समय (सांझ) | शाम लगभग 6:01 बजे |
| चंद्रोदय | रात लगभग 11:40 बजे |
ध्यान दें: ये समय दिल्ली के लिए हैं। कोटा, जयपुर, मुंबई जैसे शहरों में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। अपने शहर का सटीक समय स्थानीय पंचांग या ड्रिक पंचांग में ज़रूर देखें। अलग-अलग वेबसाइटों में मुहूर्त के समय में 1-2 मिनट का फर्क मिल सकता है।
अहोई अष्टमी क्या है?
अहोई अष्टमी करवा चौथ के लगभग चार दिन बाद, दीपावली से करीब आठ दिन पहले कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। उत्तर भारत में, खासकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में इसकी बड़ी मान्यता है। इस दिन माताएं सुबह से निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं। व्रत तारों को अर्घ्य देने के बाद खोला जाता है। कुछ परिवारों में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है, लेकिन चंद्रोदय देर रात होता है, इसलिए ज़्यादातर घरों में तारा दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है।
परंपरा के अनुसार पहले यह व्रत पुत्र की रक्षा के लिए माना जाता था। आज कई परिवारों में माताएं बेटे और बेटी, दोनों की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रखती हैं।
अहोई अष्टमी का महत्व
- संतान की आयु, स्वास्थ्य और सफलता की कामना का व्रत है।
- जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति की इच्छा होती है, वे भी श्रद्धा से यह व्रत करते हैं।
- इस दिन मथुरा के राधा कुंड में स्नान की परंपरा भी है, जिसे बहुत शुभ माना जाता है।
- दीपावली की तैयारियों के बीच यह व्रत घर में नियम, संयम और मातृत्व की भावना को मज़बूत करता है।
अहोई अष्टमी पूजा सामग्री लिस्ट
- अहोई माता का चित्र या कैलेंडर (या दीवार पर बनाई गई आकृति)
- मिट्टी या तांबे का करवा/लोटा और जल
- रोली, हल्दी, अक्षत (चावल), मौली
- धूप, दीपक, घी, रुई की बातियां
- फूल, दूर्वा, कपूर
- दूध, चावल या सिंघाड़ा, मूली, फल
- पूड़ी, हलवा और 8 पूड़ी-पुए का भोग (परिवार की परंपरा के अनुसार)
- चांदी या सोने की स्याऊ (माला में पिरोने के लिए) और मोती/मनके
- पूजा की थाली, चौकी और साफ कपड़ा
- कथा सुनने के लिए गेहूं के दाने
अहोई अष्टमी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
- संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। साफ कपड़े पहनकर हाथ में जल और चावल लेकर संतान की लंबी आयु और सुख के लिए व्रत का संकल्प लें।
- पूजा की तैयारी: शाम की पूजा से पहले घर की उत्तर-पूर्व दिशा या दीवार को साफ करें। गेरू या रोली से दीवार पर अहोई माता और स्याऊ (साही) के बच्चों की आकृति बनाएं। चित्र या कैलेंडर भी लगा सकते हैं।
- चौकी सजाएं: चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर अहोई माता का चित्र रखें। पास में जल से भरा कलश स्थापित करें और उस पर स्वास्तिक बनाएं।
- दीपक जलाएं: घी का दीपक जलाएं और गणेश जी का स्मरण करके पूजा शुरू करें।
- पूजन: अहोई माता को रोली, अक्षत, फूल, धूप और भोग अर्पित करें। चांदी की स्याऊ और मनकों की माला भी पूजा में रखें।
- कथा श्रवण: हाथ में गेहूं के सात दाने लेकर अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें। कथा पूरी होने पर दाने कलश के पास रख दें।
- आरती: अहोई माता की आरती करें और संतान के सुख की प्रार्थना करें।
- बड़ों का आशीर्वाद: सास या घर की बड़ी महिलाओं के चरण छूकर आशीर्वाद लें और उन्हें भोग या मिठाई दें।
- तारा दर्शन और अर्घ्य: तारे दिखने पर कलश के जल से तारों को अर्घ्य दें। संतान के लिए प्रार्थना करें।
- पारण: अर्घ्य के बाद व्रत खोलें। पहले जल पिएं और फिर प्रसाद या भोजन करें।
अहोई अष्टमी की व्रत कथा
बहुत समय पहले एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे और घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। एक बार दीपावली से कुछ दिन पहले साहूकार की पत्नी घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लेने जंगल गई। वह खुरपी से मिट्टी खोद रही थी कि अनजाने में उसकी खुरपी से एक साही (स्याहू) के बच्चे को चोट लग गई और उसकी मृत्यु हो गई।
इस घटना से साहूकार की पत्नी को बहुत दुख हुआ, लेकिन जो होना था हो चुका था। कुछ समय बाद उसके घर पर संकट आने लगे और एक-एक करके उसके बेटे बीमार होकर संसार से चले गए। साहूकार और उसकी पत्नी शोक में डूब गए। पत्नी बार-बार यही सोचती कि यह किसी पाप का फल है।
उसने अपने गांव की बड़ी-बूढ़ी महिलाओं को पूरी बात बताई। उन्होंने कहा, “तुमने अनजाने में जो अपराध किया है, उसका प्रायश्चित सच्चे मन से करो। कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन अहोई माता की पूजा करो, दीवार पर साही और उसके बच्चों की तस्वीर बनाओ और क्षमा मांगते हुए व्रत रखो।”
साहूकार की पत्नी ने ऐसा ही किया। उसने पूरे नियम से व्रत रखा, अहोई माता की पूजा की और तारों को अर्घ्य देकर क्षमा मांगी। उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप देखकर अहोई माता प्रसन्न हुईं। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और उसके घर में फिर से संतान का सुख लौट आया।
तभी से माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए अहोई अष्टमी का व्रत करती आ रही हैं।
सीख: अनजाने में हुई भूल पर सच्चे मन से क्षमा मांगना और श्रद्धा से व्रत करना जीवन में शांति और सुख लाता है।
अहोई अष्टमी व्रत के नियम
क्या करें
- व्रत की शुरुआत सुबह स्नान और संकल्प से करें।
- पूजा शुभ मुहूर्त में ही करें और कथा ध्यान से सुनें।
- तारों को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलें।
- पूजा में सात्विक भोग लगाएं और घर में शांति बनाए रखें।
क्या न करें
- व्रत के दिन मिट्टी खोदने या खेत-बगीचे में खुरपी से काम करने से बचें। कथा के कारण परंपरा में इसे अशुभ माना जाता है।
- किसी जीव को कष्ट न पहुंचाएं।
- झगड़ा, क्रोध और कटु वचन से दूर रहें।
- अर्घ्य से पहले व्रत न खोलें।
स्वास्थ्य संबंधी सलाह: गर्भवती, बीमार या दवा पर निर्भर महिलाएं निर्जला व्रत की जगह फलाहारी व्रत रखें। इसके लिए अपने डॉक्टर और घर के बड़ों की सलाह ज़रूर लें।
अहोई अष्टमी पर क्या दान करें?
- गरीब बच्चों को खाने-पीने की चीज़ें और कपड़े
- गाय के लिए हरा चारा
- ज़रूरतमंद परिवार को अनाज या मिठाई
- मंदिर में दीपक और घी
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
अहोई अष्टमी 2026 कब है?
अहोई अष्टमी 2026 रविवार, 1 नवंबर को है।
अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
दिल्ली-NCR के लिए पूजा का मुहूर्त शाम 5:37 से 6:55 बजे तक है। अपने शहर का समय स्थानीय पंचांग में देखें।
अहोई अष्टमी का व्रत कब खोला जाता है?
तारे दिखने के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। दिल्ली में तारे लगभग 6:01 बजे दिखने लगते हैं। कुछ परिवार चंद्रोदय के बाद व्रत खोलते हैं, जो रात लगभग 11:40 बजे होता है।
क्या अहोई अष्टमी का व्रत सिर्फ बेटे के लिए होता है?
पारंपरिक रूप से इसे पुत्र के लिए बताया गया है, पर अब माताएं बेटे और बेटी, दोनों की भलाई के लिए यह व्रत रखती हैं।
अहोई अष्टमी और करवा चौथ में क्या अंतर है?
करवा चौथ पति की लंबी आयु के लिए और अहोई अष्टमी संतान की लंबी आयु और सुख के लिए रखा जाता है। करवा चौथ का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देकर और अहोई अष्टमी का व्रत आमतौर पर तारों को अर्घ्य देकर खोला जाता है।
क्या अहोई अष्टमी पर निर्जला व्रत ज़रूरी है?
परंपरा में निर्जला व्रत बताया गया है, लेकिन स्वास्थ्य के अनुसार फलाहारी व्रत भी रखा जाता है। अपने परिवार की परंपरा और डॉक्टर की सलाह का पालन करें।








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